Jaunsar Bawar Tribal Welfare Society, Delhi {जौनसार बावर जनजातीय कल्याण समिति, दिल्ली }
यमुना टौंस का स्थापत्य - { श्री इन्द्र सिंह नेगी}

उत्तराखण्ड के लोक जीवन में कलाओं का प्रभाव तथा महत्व स्पष्ट रूप से दृष्टिगोचर होता है । सभ्यता/संस्कृति में जैसे-जैस परिवर्तन होन लगे, लोक शिल्पियों ने समयानुरऊप इनमे परिवर्तन तो किये किन्तु इसके मूल में छिपी सौन्दर्य बोध की मान्यता, मनोरंजन का भाव सदैव यथावत रहा । इन लोक कलाओं का प्रभाव वेश-भूषा, खान-पान, रहन-सहन, अलंकरण, शारीरिकांकन, उपकरणों, चित्रांकन, साजों (वाद्यों), गीत/नृत्यों तथा भवन निर्माण की शैली आदि पर झलकता है ।

यमुना-टोन्स घाी जो अपनेआप में बहुत बड़े सांस्कृतिक समूह का प्रतिनिधित्व करती है, यहां लोक कलाएं मौलिक एंव विशिष्ट हैं । इन घाटियों में जनवास तथा देवालयों के निर्माण की शैली प्राचीनतम स्थापत्य कला के बेजोड़ नमूने हैं । किसी भी क्षेत्र या स्थान का स्थापत्य की भू संरचना के सापेक्ष की अधिकता होनेके कारण जनवास व देवालयों में इनकाप्रयोग किया गया है । प्राचीन देवालयों का स्वरुप जनवासों की तरह ही होता थाकिन्तु ये आकार प्रकार में विस्तृत एंव अलंकारिक होते थे । यहां पुराने समय से ही काष्ठ आधारित मन्दिरों का निर्माण/विकास हुआ, जिसे पुरातत्व शास्त्रियों ने यामुनी शैली की संज्ञा दी । देवालय निर्माण में दो प्रकार की निर्माण शैली अस्तित्वमें आई, एक वह जिसमें सम्पूर्ण संरचना में काष्ठ का प्रयोग होता था, जैसे कुणा (बावर)का देवालय । दूसरी वह जिसमें पत्थर के साथ छतों पर काष्ठ का प्रयोग हुआ है ।जौनसार बावर में देवालय अधिकांशत: दो मंजिलें पाये गये है, प्रथम तल का उपयोग भण्डार तथा द्वितीय तल में देवताकी डोली रखी जाती है । जहां श्री बौठा महासू , दोनों की डोलियां विराजमान है वहां जोडी मन्दिर अस्तित्व में है, अर्थात मन्दिर तो एकही है किन्तु छत अलग-अलग, स्थान अलग-अलग । इन मन्दिरों के प्रथम मंजिल का निर्माण प्रस्तर, जिसके बीच बीच में लकडी के चेंऊ (स्लीपर) ताकिलकड़ी का कसाव बना रहे व किसी आपदा से सुरक्षितरहे, से हुआ है । दूसरी मंजिल के निर्माण में आगे-पीछे प्रस्तर को छोडकर शेषभाग में काष्ठ का प्रयोग हुआ है । छतें ढालदार हैतथा स्लेटी पत्थरों से अच्छादित है ।बिसोई का वर्तमान महासू मन्दिर, सिमोग का सिलगूर मन्दिर, लखवाड़ तथा थैना के पुराने देवालय इसके प्रमुख उदाहरण है

 

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